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श्रीमद्भागवत कथा श्रवण से भगवान में तन्मय हो जाता है मन : आचार्य मृदुल कृष्ण शास्त्री…

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श्रीमद्भागवत कथा श्रवण से भगवान में तन्मय हो जाता है मन : आचार्य मृदुल कृष्ण शास्त्री

 

खरसिया। अजित सिंह नगर, कन्या भवन के पास आयोजित विशाल श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के द्वितीय दिवस परम श्रद्धेय अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक आचार्य गोस्वामी श्री मृदुल कृष्ण जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के विभिन्न आध्यात्मिक प्रसंगों का विस्तार से वर्णन करते हुए भक्तों को भक्ति, सत्य और निष्कपट धर्म का संदेश दिया।

आचार्य श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण मात्र करने से व्यक्ति की तन्मयता भगवान में होने लगती है। धर्म जगत में किए जाने वाले योग, यज्ञ, तप, अनुष्ठान आदि सभी साधनाओं का मूल उद्देश्य यही है कि हमारी भक्ति भगवान में लगी रहे और हम अहर्निश, प्रतिक्षण प्रभु प्रेम में समाए रहें।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को संसार के प्रत्येक कण में अपने प्रभु के दर्शन की भावना विकसित करनी चाहिए। श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से भक्त के हृदय में ऐसी भावनाएं जागृत होती हैं कि उसका मन, वाणी और कर्म भगवान में लीन होने लगते हैं।

‘सत्यं परं धीमहि’ का महत्व बताया

आचार्य श्री ने श्रीमद्भागवत के मंगलाचरण में सत्य की वंदना के महत्व को समझाते हुए कहा कि सत्य व्यापक है, सत्य सर्वत्र है और सत्य की चाह प्रत्येक व्यक्ति को होती है। पिता अपने पुत्र से सत्य की अपेक्षा करता है, भाई अपने भाई से सत्य के मार्ग पर चलने की कामना रखता है और मित्र भी मित्र से सत्यता निभाने की अपेक्षा करता है। यहां तक कि चोरी करने वाले व्यक्ति भी अपने साथियों से सत्यता की अपेक्षा रखते हैं।

इसीलिए श्रीवेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत के प्रारंभ में सत्य की वंदना के माध्यम से मंगलाचरण किया है। आचार्य श्री ने कहा कि “सत्यं परं धीमहि” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का मूल संदेश है।

उन्होंने कहा कि सत्य ही श्रीकृष्ण हैं, सत्य ही प्रभु श्रीराम हैं, सत्य ही भगवान शिव हैं और सत्य ही मां दुर्गा का स्वरूप है। जो व्यक्ति कथा का श्रवण करके सत्य को अपने जीवन में धारण करता है, वह सत्य में रम जाता है और सत्य रूपी परमात्मा के प्रति उसके हृदय में विशेष तन्मयता उत्पन्न होती है।

निष्कपट धर्म ही भागवत धर्म

आचार्य श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत में निष्कपट धर्म का वर्णन किया गया है। जिसके हृदय में कपट और ईर्ष्या नहीं है, वही व्यक्ति भागवत कथा के वास्तविक भाव को समझने और आत्मसात करने का अधिकारी है।

उन्होंने कहा कि जीवन का सर्वश्रेष्ठ परम धर्म यही है कि मनुष्य के हृदय में अपने इष्ट के प्रति प्रगाढ़ भक्ति उत्पन्न हो जाए। भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण ही जीवन को सार्थक बनाने का सबसे सरल मार्ग है।

भागवत वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ फल

कथा क्रम में आचार्य श्री ने श्रीमद्भागवत की महिमा बताते हुए इसे वेदरूपी वृक्ष का पका हुआ फल बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार पका हुआ फल पूर्ण रूप से रस से परिपूर्ण होता है, उसी प्रकार श्रीमद्भागवत भी भक्ति और भगवान के प्रेम के अमृत रस से परिपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि अन्य फलों में गुठली और छिलका होता है, लेकिन भागवत रूपी फल में केवल रस ही रस है। इसलिए मनुष्य को इस अमृतमयी कथा का जीवन पर्यंत पान करते रहना चाहिए।

द्वितीय दिवस की कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्तिमय वातावरण में श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भागवत कथा का रसपान किया।

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