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क्या आप जानते है गणेश जी को दूर्वा क्यों अर्पित करते है

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देवताओं के जिस प्रिय ‘मोदक’ और ‘लड्डू’ को भगवान गणेश का सबसे पसंदीदा भोग माना जाता है… क्या आप जानते हैं कि एक भयानक दैत्य की भस्म से जलते हुए गणेश जी के पेट की आग को बुझाने के लिए ऋषियों ने उन्हें कोई मिठाई नहीं, बल्कि एक तुच्छ हरी घास (दूर्वा) की २१ पत्तियाँ क्यों खिलाई थीं?

प्राचीन काल में ‘अनलकासुर’ नाम का एक अत्यंत विकराल और भयानक दैत्य उत्पन्न हुआ। ‘अनलक’ का अर्थ ही होता है—अग्नि (आग) उसने ऐसी घोर तपस्या की थी कि उसे एक विचित्र और प्रलयंकारी शक्ति प्राप्त हुई थी जब भी वह क्रोधित होता, उसकी दोनों आँखों से साक्षात प्रलय की आग की लपटें निकलती थीं।
वह अपनी दृष्टि मात्र से खड़े-खड़े नगरों, वनों और पर्वतों को जलाकर राख कर देता था अनलकासुर ने देवलोक और पृथ्वी पर ऐसा तांडव मचाया कि ऋषि-मुनियों के यज्ञ-कुंड नष्ट हो गए, स्वर्ग के बगीचे जलकर खाक हो गए और जो कोई भी उसके सामने आता, वह उसे अपनी आँखों से जलाकर जीवित ही निगल जाता था।

इंद्र, वरुण, अग्नि और यमराज जैसे महाबली देवता भी अनलकासुर की दहकती दृष्टि के आगे ठहर न सके। उसके नेत्रों की तपन इतनी भयानक थी कि देवता पास जाने से पहले ही झुलसने लगते थे।
हारकर समस्त देवता देवाधिदेव महादेव के पास कैलाश पहुँचे। भगवान शिव ने देवताओं की व्यथा सुनकर कहा:
हे देवगण! अनलकासुर की अग्नि को शांत करना किसी साधारण अस्त्र या शक्ति के वश में नहीं है। इस चराचर जगत में केवल एक ही शक्ति है जो इस प्रलयंकारी अग्नि को अपने भीतर समा सकती है—वह हैं विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश। केवल वही इस संकट से उबार सकते हैं।समस्त देवताओं ने हाथ जोड़कर भगवान गणेश का आह्वान किया। बाल गणेश अपने मूषक पर सवार होकर मुस्कुराते हुए प्रकट हुए।

भगवान गणेश रणभूमि में अनलकासुर के सामने आ खड़े हुए।
अनलकासुर ने जब एक नन्हे बालक, गजमुख रूप को देखा, तो वह अट्टहास करते हुए हँसा। उसने अपनी दोनों आँखें पूरी खोल दीं। उसकी आँखों से सूर्य के समान धधकती ज्वालाएँ गणेश जी की ओर लपकीं परंतु गणेश जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। इससे पहले कि वह दैत्य कुछ समझ पाता, भगवान गणेश ने अपना विराट रूप धारण किया और एक क्षण में उस धधकते हुए विशालकाय अनलकासुर को सीधे अपने मुख में डालकर जीवित ही निगल लिया!

दैत्य का अंत हो गया, आकाश से देवता जय-जयकार करने लगे।
परंतु असली संकट तो अब शुरू हुआ था अनलकासुर कोई साधारण दैत्य नहीं था, वह साक्षात जीवित अग्नि था। जैसे ही वह गणेश जी के उदर (पेट) में पहुँचा, भगवान गणेश के पेट के भीतर भयानक दाह (अग्नि की जलन) शुरू हो गई गणेश जी का पूरा शरीर तवे की तरह तपने लगा उनका कंठ सूखने लगा और उनके शरीर से इतनी भयंकर ऊष्मा (गर्मी) निकलने लगी कि पूरे ब्रह्मांड का तापमान बढ़ने लगा समुद्र का जल खौलने लगा और देवलोक तपने लगा।

देवता घबरा गए कि दैत्य तो मर गया, परंतु अब स्वयं विघ्नहर्ता के शरीर की आग कैसे शांत हो? देवताओं ने अपने-अपने शीतल उपचार शुरू किए:देवराज इंद्र ने बादलों को आदेश देकर अमृतमयी मूसलाधार वर्षा करवाई, परंतु गणेश जी के पेट की अग्नि शांत न हुई वरुण देव ने क्षीरसागर का ठंडा जल उनके ऊपर उड़ेला, वह जल गणेश जी के शरीर को छूते ही भाप बनकर उड़ गया भगवान शिव ने अपनी जटाओं से शीतल चंद्रमा को उतारकर गणेश जी के मस्तक और पेट पर बांध दिया (जिसके कारण गणेश जी को ‘भालचंद्र’ भी कहा जाता है), परंतु चंद्रमा की ठंडक भी उस उदर-अग्नि को शांत न कर सकी।

जब सारे देवी-देवता हार गए, तब वहाँ त्रिकालदर्शी महर्षि कश्यप और ८८ हज़ार ऋषि-मुनि उपस्थित हुए महर्षि कश्यप ने अपनी तपोदृष्टि से देखा कि इस आसुरी अग्नि का शमन किसी बाह्य शीतलता से नहीं, बल्कि धरती के सबसे सरल, सात्विक और अहंकार-रहित तत्व से ही हो सकता है महर्षि कश्यप ने पास के मैदान से हरी घास (दूर्वा) की २१ गाठें (पत्तियाँ) तोड़ीं ऋषियों ने उस दूर्वा को मंत्रों से अभिमंत्रित किया और भगवान गणेश से प्रार्थना की:
हे लंबोदर! यह दूर्वा साक्षात धरती माता की सरलता, शीतलता और अमृतमयी संजीवनी शक्ति का प्रतीक है। कृपा करके इसे अपने मुख में धारण कीजिए।

भगवान गणेश ने जैसे ही दूर्वा की २१ पत्तियों को चबाकर निगला, एक अलौकिक चमत्कार हुआ उस नन्हीं सी हरी घास के पेट में पहुँचते ही अनलकासुर की भयंकर अग्नि एक क्षण में बुझकर शांत हो गई। भगवान गणेश का पूरा शरीर शीतल, शांत और आनंदित हो गया। उनके चेहरे पर वही बाल-सुलभ मुस्कान पुनः लौट आई।
भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर समस्त देवताओं और ऋषियों के सामने यह घोषणा की:आज से जो कोई भी भक्त मुझे सोने, चांदी, हीरे या छप्पन भोग के स्थान पर केवल श्रद्धा से ‘२१ दूर्वा’ (हरी घास) अर्पित करेगा, मैं उस पर सबसे अधिक प्रसन्न रहूँगा। उसके जीवन के सारे कष्ट, मानसिक क्लेश और विघ्न उसी प्रकार जलकर शांत हो जाएँगे, जैसे इस दूर्वा से मेरे उदर की अग्नि शांत हुई है!

!! जय श्री #गणेश !! जय श्री #कृष्णा!!

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