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विनायक चतुर्थी क्यों होती है खास..?

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विनायक चतुर्थी क्यों होती है खास?

8 नवम्बर, 2021 (सोमवार)

कार्तिक माह की ‘विनायक चतुर्थी’ 8 नवम्बर को है, बता दें कि एक महीने में दो बार विनायक चतुर्थी आती है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सारे कष्टों का निवारण हो जाता है और उसे धन-वैभव और सुख की प्राप्ति होती है। गणेश भगवान बेहद मोहिल, बुद्दिमान और ऊर्जवान माने जाते हैं और इसी वजह से इनकी पूजा करने वालों को भी ये गुण हासिल होते हैं।

विनायक चतुर्थी का महत्व

सुख-सौभाग्य में वृद्धि के लिए ये व्रत काफी फलदायी है। भगवान श्री गणेश की कृपा से सिद्धि-बुद्धि, ज्ञान-विवेक की प्राप्ति होती है। व्रत के प्रभाव से इंसान धनी बनता है और अपनी जिंदगी में तरक्की करता है। आज के दिन व्रत करने से संतान प्राप्ति में आ रही रूकावट दूर होती है।

विनायक चतुर्थी पूजा-विधि

सुबह उठ कर स्नान करें। स्नान करने के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। भगवान गणेश को स्नान कराएं। स्नान के बाद भगवान गणेश को साफ वस्त्र पहनाएं। भगवान गणेश को सिंदूर का तिलक लगाएं। सिंदूर का तिलक अपने माथे में भी लगाना चाहिए। गणेश भगवान को दुर्वा अतिप्रिय होता है। भगवान गणेश को दुर्वा अर्पित करना चाहिए। गणेश जी को लड्डू, मोदक का भोग लगाएं। अब श्री मंदिर पर भगवान श्रीगणेश जी की आरती करें।

विनायक चतुर्थी की कथा

एकबार माता पार्वती एक बालक की मूर्ति बनाकर उसमें जान फूंकती हैं। इसके बाद वे कंदरा में स्थित कुंड में स्नान करने के लिए चली जाती हैं। लेकिन जाने से पहले माता अपने पुत्र को आदेश देती हैं कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी व्यक्ति को कंदरा में प्रवेश नहीं करने देना। बालक अपनी माता के आदेश का पालन करने के लिए कंदरा के द्वार पर पहरा देने लगता है। कुछ समय बीत जाने के पश्चात भगवान शिव वहां पहुंचते हैं। भगवान शिव जैसे ही कंदरा के अंदर जाने लगते हैं तो वह बालक उन्हें रोक देता है। महादेव बालक को समझाने का प्रयास करते हैं। लेकिन वह उनकी एक नहीं सुनता है। जिससे क्रोधित होकर भगवान शिव त्रिशूल से बालक का शीश धड़ से अलग कर देते हैं।

इस घटना का पता जब माता पार्वती को हुआ तो वह स्नान करके कंदरा से बाहर आती हैं और देखती हैं कि उनका पुत्र धरती पर प्राण विहीन पड़ा है। उसका शीश उसके धड़ से अलग कटा हुआ है। यह दृष्य देखकर माता क्रोधित होती हैं। जिसे देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं। तब भगवान शिव अपने गणों को आदेश देते हैं कि ऐसे बालक का सिर ले आओ जिसकी माता की पीठ उसके बालक की ओर हो। शिवगण एक हथनी के बालक का शीश लेकर आते हैं। भगवान शिव गज के शीश को बालक के धड़ से जोड़कर उसे जीवित कर देते हैं। इसके बाद माता पार्वती शिवजी से कहती हैं कि यह शीश गज का है जिसके कारण सब मेरे पुत्र का उपहास करेंगे। तब भगवान शिव बालक को वरदान देते हैं कि आज से संसार इन्हें गणपति के नाम से जानेगा। इसके साथ ही सभी देव भी उन्हें वरदान देते हैं कि आज से वह प्रथम पूज्य हैं।

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