गर्डर तो चढ़ गया… पर क्या हवा में उड़कर पुल पार करेगी खरसिया की जनता? झाराडीह आरओबी: रेलवे ने अपनी पीठ थपथपाई, इधर एप्रोच रोड के अभाव में ‘दिल्ली अभी बहुत दूर’..
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गर्डर तो चढ़ गया… पर क्या हवा में उड़कर पुल पार करेगी खरसिया की जनता?
झाराडीह आरओबी: रेलवे ने अपनी पीठ थपथपाई, इधर एप्रोच रोड के अभाव में ‘दिल्ली अभी बहुत दूर’

तकनीकी वाहवाही के बीच कागजों में सिमटी राहत; भू-अर्जन, यूटिलिटी शिफ्टिंग और पीडब्ल्यूडी की सुस्ती से अटकी आम जनता की सांसें
खरसिया (सीजी न्यूज़ लाइव):
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (बिलासपुर मंडल) ने झारसुगुड़ा–बिलासपुर रेलखंड के झाराडीह यार्ड स्थित समपार फाटक क्रमांक 316 पर विशाल ‘बो-स्ट्रिंग गर्डर’ की सफल लॉन्चिंग का ढिंढोरा तो जोर-शोर से पीट दिया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि खरसिया की जनता के लिए यह ओवरब्रिज आज भी एक छलावा बना हुआ है। रेलवे ने अपने हिस्से का ब्लॉक लेकर पटरियों के ऊपर लोहे का भारी-भरकम ढांचा खड़ा कर दिया, मगर सवाल यह उठता है कि दोनों छोर पर सड़क के नाम पर फैले मलबे और गड्ढों के बीच गाड़ियां इस पर चढ़ेंगी कैसे?
रेलवे ने झाड़ा पल्ला, पीडब्ल्यूडी के पाले में गेंद
किसी भी ओवरब्रिज का ढांचा दो विभागों की साझी जिम्मेदारी पर टिका होता है। पटरियों के ऊपर का स्पैन रेलवे का होता है, जबकि जनता को उस पर चढ़ाने-उतारने वाली एप्रोच रोड का जिम्मा राज्य के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और स्थानीय प्रशासन का होता है। रेलवे ने अपनी तकनीकी बाजीगरी दिखाकर संरक्षा कार्य पूरे होने का दावा ठोक दिया, लेकिन धरातल पर पीडब्ल्यूडी का काम कछुआ चाल से भी बदतर गति से रेंग रहा है। जब तक दोनों ओर के एप्रोच स्लैब और रिटेनिंग वॉल तैयार नहीं होते, हवा में टंगा यह गर्डर केवल फाइलों का पेट भरने के काम आएगा।
फाइलें दबाए बैठा प्रशासन, भू-अर्जन और शिफ्टिंग में फंसा पेंच
सूत्रों की मानें तो इस प्रोजेक्ट में सबसे बड़ा रोड़ा प्रशासनिक तालमेल की कमी है।
- अधूरा भू-अर्जन: एप्रोच रोड के दायरे में आने वाली जमीनों के अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया अब तक पूरी तरह सुलझ नहीं पाई है।
- यूटिलिटी शिफ्टिंग का रोना: हाईटेंशन बिजली लाइनें, ट्रांसफॉर्मर और पाइपलाइन हटाने के लिए विभागों के बीच केवल कागजी पत्राचार चल रहा है।
- फिनिशिंग अभी मीलों दूर: डेक स्लैब की ढलाई, कंक्रीट की क्यूरिंग, क्रैश बैरियर और डामरीकरण का काम शुरू होने में ही महीनों का वक्त लग सकता है।
दिन में दर्जनों बार गिरता फाटक, जनता बेहाल
इस रूट पर मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों के भारी दबाव के चलते समपार फाटक 316 दिन में दर्जनों बार बंद होता है। एम्बुलेंस जाम में सायरन बजाती रह जाती हैं, स्कूली बच्चे तपती धूप और धूल में फंसे रहते हैं और रोजमर्रा के राहगीरों का कीमती वक्त बर्बाद होता है। जनता का सीधा आरोप है कि जब तक जनप्रतिनिधि और अफसर सड़क पर उतरकर काम की रफ्तार नहीं बढ़ाते, तब तक रेलवे के इस ‘गर्डर’ से धूल फांकती जनता को रत्ती भर भी राहत नहीं मिलने वाली।
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