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पर्दाफाश

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पुलिस का राजनीतिक हथियार: हाईकोर्ट वकील को जेल में ठूंसने वाली व्यवस्था को न्यायालय ने धूल चटा दी…

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पुलिस का राजनीतिक हथियार: हाईकोर्ट वकील को जेल में ठूंसने वाली व्यवस्था को न्यायालय ने धूल चटा दी!

**ग्वालियर/दिल्ली, 7 जनवरी 2026 (प्रचंड प्रहार विशेष मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक ऐसा तमाचा मारा है कि पुलिस महकमे के कानों में आज भी खनक रही है! हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता **एडवोकेट अनिल मिश्रा को डॉ. अंबेडकर के चित्र जलाने** के नाम पर राजनीतिक बदले की आग में झोंक दिया गया था। लेकिन **6 जनवरी 2026** को **जस्टिस जी.एस. अलूवालिया** और **जस्टिस आशीष श्रोती** की डिवीजन बेंच ने न सिर्फ उन्हें **जमानत दे दी**, बल्कि **पुलिस की भयंकर लापरवाही, प्रक्रिया का घोर उल्लंघन और राजनीतिक दबाव** को **नंगा कर दिया**। यह केवल एक वकील की जमानत की कहानी नहीं, बल्कि **हर आम नागरिक के मौलिक अधिकारों** की **रक्षा का ऐतिहासिक फैसला** है!

राजनीतिक बदले की गिरफ्तारी: पहले पकड़ा, फिर FIR बनाई!

**27 दिसंबर 2025** को ग्वालियर साइबर पुलिस ने अनिल मिश्रा सहित 4 लोगों को **बिना नोटिस, बिना वारंट** सीधे **हाथों में बेड़ियां डाल दीं**। फिर उसके बाद **FIR दर्ज की**! हाईकोर्ट ने चिल्लाकर कहा — **”यह अवैध हिरासत है!”** सामान्य प्रक्रिया तो यह होती है कि पहले FIR, फिर जांच, फिर गिरफ्तारी। लेकिन यहां **राजनीतिक दबाव** में **उल्टा क्रम** अपनाया गया। कोर्ट ने साफ कहा — **”पुलिस ने पहले व्यक्ति को कैद किया, फिर अपराध गढ़ा!”

परिवार को सूचना तक न दी गई!

गिरफ्तारी के समय अनिल मिश्रा का परिवार अंधेरे में तड़पता रहा। यह **भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023** की **धारा 36** का **खुला उल्लंघन** है। कोर्ट ने पुलिस को **लताड़ा** **”क्या यही है कानून का राज?”

## **BNSS की धाराओं का कत्लेआम: पुलिस ने कानून को पैरों तले रौंदा!**

हाईकोर्ट ने **BNSS की इन धाराओं का घोर उल्लंघन** उजागर किया:

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🔴 धारा 35(1): बिना वारंट गिरफ्तारी से पहले नोटिस अनिवार्य — नोटिस दिया ही नहीं!
🔴 धारा 35(3): नोटिस में अपराध विवरण स्पष्ट होना चाहिए — नोटिस ही गायब!
🔴 धारा 36: परिवार को तत्काल सूचना — परिवार को 24 घंटे भटकाया!
🔴 धारा 39: गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष समय पर प्रस्तुत करना — प्रक्रिया में घपले!
🔴 धारा 57: 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुति — समयबद्धता ताक पर!
“`
**SC/ST Act की धारा 15-A(3)** का भी **मजाक उड़ाया गया**। शिकायतकर्ता **मकरंद बौद्ध** (जो खुद अन्य मामलों में फरार हैं) को जमानत याचिका की कॉपी तक नहीं दी गई। कोर्ट ने कहा — **”यह जानबूझकर प्रक्रिया बाधित करने की साजिश थी!”** [6][7]

*पुलिस की चयनात्मक निष्क्रियता: कोर्ट का सबसे घातक सवाल!**

हाईकोर्ट ने **पुलिस की पोल खोलते हुए** सबसे खतरनाक सवाल दागा:

> **”जब अंबेडकर का चित्र जलाया जा रहा था, तो IG ऑफिस और SP ऑफिस के सामने खड़ी पुलिस सो रही थी क्या? रोकने की कोशिश क्यों नहीं की?”**

यह **चयनात्मक लापरवाही** का सबूत है!
– **चित्र जलाते समय**: पुलिस **निष्क्रिय**
– **10 दिन बाद**: **सुपर एक्टिव**, बिना नोटिस के गिरफ्तारी!

कोर्ट ने फरमाया — **”एफआईआर दर्ज करके नोटिस देना काफी था। गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होता है, पहला नहीं!”** यह **राजनीतिक दबाव** का **स्पष्ट प्रमाण** है।

## **हाईकोर्ट वकील को ठुकराया, आम आदमी का क्या हाल?**

**सोचिए!**
– **हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष** को **10 दिनों तक जेल की काल कोठरी** में सड़ा दिया गया
– **BNSS की 5 धाराओं** का **खुला उल्लंघन**
– **परिवार को अंधेरे में रखा**
– **SC/ST Act** के बावजूद **नोटिस प्रक्रिया** तोड़ी गई

**तो गरीब किसान, मजदूर, छोटा व्यापारी का क्या बनेगा?**
वरिष्ठ वकील → 10 दिन जेल + प्रक्रिया का कत्ल
आम आदमी → ??? (कल्पना से परे!)
“`

**यही है “सबका साथ, सबका विकास”** वाली पुलिस व्यवस्था!

## **जमानत के शर्तें: न्याय का संदेश**

**6 जनवरी 2026** को **3 दिनों की मैराथन सुनवाई** के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया:

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✅ तत्काल रिहाई का आदेश
✅ 1 लाख रुपये व्यक्तिगत बांड
✅ 1 लाख रुपये जमानत राशि
✅ FIR वैध, लेकिन कस्टडी अवैध
✅ पुलिस को प्रक्रिया पालन का सख्त निर्देश
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**महत्वपूर्ण**: कोर्ट ने **FIR को सही माना**, लेकिन **गिरफ्तारी को पूरी तरह गलत** ठहराया।

## **5 स्पष्ट राजनीतिक दबाव के प्रमाण**

1. **पहले गिरफ्तारी, फिर FIR** — प्रक्रिया उल्टी!
2. **BNSS धारा 35 नोटिस गायब** — जानबूझकर!
3. **परिवार सूचना रोकना** — दुर्भावनापूर्ण!
4. **SC/ST Act नोटिस अनदेखा** — साजिश!
5. **चित्र जलाते समय निष्क्रियता** — बाद में अति-कार्रवाई!

## **राष्ट्रीय महत्व: संविधान के अनुच्छेद 21 की रक्षा**

यह फैसला **अनुच्छेद 21** (**जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता**) और **अनुच्छेद 14** (**कानून के समक्ष समानता**) की **मजबूत दुर्ग** है। कोर्ट ने स्थापित किया:

> **”प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना अपराध! पुलिस विवेक कानून के दायरे में ही!”**

## **नागरिकों के लिए क्रांतिकारी अधिकार सूची**

**अब पुलिस के सामने सिर झुकाना बंद!**

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1️⃣ BNSS धारा 35: “नोटिस दिखाओ, वरना गिरफ्तारी नहीं!”
2️⃣ धारा 36: “परिवार को सूचना दो!”
3️⃣ 24 घंटे नियम: “मजिस्ट्रेट के पास ले चलो!”
4️⃣ SC/ST Act: “शिकायतकर्ता को नोटिस अनिवार्य!”
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## **पुलिस को चेतावनी: अब प्रक्रिया तोड़ना महंगा पड़ेगा!**

**हाईकोर्ट ने पुलिस को ललकारा**:
– **राजनीतिक दबाव में प्रक्रिया मत तोड़ो!**
– **गिरफ्तारी अंतिम हथियार, पहला नहीं!**
– **नोटिस प्रक्रिया अनिवार्य!**

आम आदमी की जीत!**

**जब हाईकोर्ट के सबसे बड़े वकील को इस तरह कुचल सकते हैं, तो सड़क पर चलने वाले मेहनतकश का क्या हाल होगा?**

यह फैसला **हर उस नागरिक के लिए उम्मीद की किरण** है जो **पुलिस के मनमानेपन** का शिकार होता है। **प्रचंड प्रहार** स्पष्ट चेतावनी देता है:

> **”पुलिस अब हथियार नहीं, सेवक है! कानून सबके लिए बराबर!”**

**लोकतंत्र का असली परीक्षण यहीं है — जब सबसे ताकतवर को भी कानून के दायरे में लाया जाए!*

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