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महाराजा अग्रसेन जयंती…….

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महाराजा अग्रसेन जयंती

7 अक्टूबर, 2021 गुरूवार

महाराजा अग्रसेन जी की ख्याति अग्रवाल समाज अथवा वैश्य समाज के जनक के रुप में फैली हुई है। शरद नवरात्रि के पहले दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को महाराजा अग्रसेन जयंती मनाई जाती है। क्षत्रिय कुल में जन्में अग्रसेन जी को पशुओं की बलि आदि देने से घोर नफरत थी, इसलिए उन्होंने अपना क्षत्रिय धर्म छोड़कर वैश्य धर्म स्वीकार किया था। अपनी दया और करुणा के लिए पहचाने जाने वाले महाराजा अग्रसेन जी ने व्यापारियों के राज्य अग्रोहा की स्थापना की थी। वहीं अग्रवाल समाज के सभी 18 गोत्रों का जन्म इन 18 पुत्रों के नाम पर किया गया था। महाराजा अग्रसेन का जन्म विक्रम संवत् शुरु होने से करीब 3130 साल पहले हुआ था। उनके पिता का नाम महाराजा वल्लभसेन और माता का नाम भगवती देवी था। महाराजा अग्रसेन की दो पत्नियां थी, पहली पत्नी का नाम माधवी और दूसरी पत्नी का नाम सुंदरावती था। उनके 18 पुत्र थे।

महाराजा अग्रसेन जीवन परिचय व इतिहास

अग्रसेन राजा वल्लभ सेन के सबसे बड़े पुत्र थे। कहा जाता हैं इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम चरण में हुआ था, जिस वक्त राम राज्य हुआ करते थे अर्थात राजा प्रजा के हित में कार्य करते थे, देश के सेवक होते थे। यही सब सिद्धांत राजा अग्रसेन के भी थे जिनके कारण वे इतिहास में अमर हुए। इनकी नगरी का नाम प्रतापनगर था। बाद में इन्होने अग्रोहा नामक नगरी बसाई थी। इन्हें मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं एवम जानवरों से भी लगाव था, जिस कारण उन्होंने यज्ञों में पशु की आहुति को गलत करार दिया और अपना क्षत्रिय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म की स्थापना की इस प्रकार वे अग्रवाल समाज के जन्म दाता बने। इनकी नगरी अग्रोहा में सभी मनुष्य धन धान्य से सकुशल थे। यह एक प्रिय राजा की तरह प्रसिद्ध थे। इन्होने महाभारत युद्ध में पांडवो के पक्ष में युद्ध किया था।

इनका विवाह नागराज कन्या माधवी से हुआ था। माधवी बहुत सुंदर कन्या थी। उनके लिए स्वयंबर रखा गया था, जिसमे राजा इंद्र ने भी भाग लिया था, लेकिन कन्या ने अग्रसेन को चुना, जिससे राजा इंद्र को अपमान महसूस हुआ और उन्होंने प्रताप नगर में अकाल की स्थिती निर्मित कर दी, जिसके कारण राजा अग्रसेन ने इंद्र देव पर आक्रमण किया। इस युद्ध में अग्रसेन महाराज की स्थिती बेहतर थी। इस प्रकार उनका जीतना तय लग रहा था, लेकिन देवताओं ने नारद मुनि के साथ मिलकर इंद्र और अग्रसेन के बीच का बैर खत्म किया। अब आगे जानते है अग्रवाल समाज की उत्पति कैसे हुई।

कैसे हुई अग्रवाल समाज की उत्पत्ति

राजा अग्रसेन ने वैश्य जाति का जन्म तो कर दिया, लेकिन इसे व्यवस्थित करने के लिए 18 यज्ञ हुए और उनके आधार पर गौत्र बनाये गए।

अग्रसेन महाराज के 18 पुत्र थे। उन 18 पुत्रों को यज्ञ का संकल्प दिया गया, जिन्हें 18 ऋषियों ने पूरा करवाया। इन ऋषियों के आधार पर गौत्र की उत्त्पत्ति हुई, जिसने भव्य 18 गोत्र वाले अग्रवाल समाज का निर्माण किया। इसी के साथ अब आगे जानते है महाराजा अग्रसेन ने अग्रोहा की स्थापना कैसे की।

अग्रोहा की स्थापना

माता लक्ष्मी के आदेशानुसार प्रतापनगर के प्रिय राजा महाराजा अग्रसेन एक नए राज्य के लिए जगह का चयन करने के लिए अपनी रानी के साथ भारत भ्रमण पर निकल पड़े। उन्होंने अपनी इस यात्रा के दौरान एक समय में उन्हें अपनी इस यात्रा के दौरान कुछ बाघ शावक और भेड़िया शावकों को एक साथ देखा और इसे उन्होंने शुभ संकेत एवं बहादुरी की कर्मभूमि समझते हुए चुना और अपने नए राज्य अग्रोहा की स्थापना की। आपको बता दें कि शुरुआत में कुछ ॠषि मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर उन्होंने अपने नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा, जिसे बाद में अग्रोहा कर दिया गया। आपको बता दें कि अग्रोहा हरियाणा प्रदेश के हिसार के पास स्थित है, यहां माता लक्ष्मी का विशाल मंदिर जहां देवी बेहद आर्कषक रुप में विराजमान हैं। इस संस्कृति की स्थापना से ही जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। वर्तमान में अग्रोहा का काफी विकास हो रहा है। यहां महाराजा अग्रसेन और माता वैष्णव देवी का भी एक भव्य मंदिर है। महाराजा अग्रसेन ने एक सिद्धांत भी दिया था जिसका नाम था ”एक ईंट और एक रुपया” का सिद्धांत।

”एक ईंट और एक रुपया” का सिद्धांत

महाराजा अग्रसेन का ”एक ईट और एक रुपया” का सिद्धांत काफी प्रचलित है। दरअसल, एक बार अग्रोहा में अकाल पड़ने से चारों तरफ भूखमरी, महामारी जैसे विकट संकट की स्थिति पैदा हो गई थी।वहीं इस विकट समस्या का हल निकालने के लिए जब अग्रसेन महाराज अपनी वेष-भूषा बदलकर नगर का भ्रमण कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई।ऐसे में समस्या का समाधान ढूंढने के लिए अग्रसेन जी वेश बदलकर नगर भ्रमण कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि एक परिवार में सिर्फ 4 लोगों का भी खाना बना था, और उस परिवार में एक मेहमान के आने पर खाने की समस्या उत्पन्न हो गई, तब परिवार के सदस्यों ने अपनी-अपनी थालियों से थोड़ा-थोड़ा खाना निकालकर आए मेहमान के लिए पांचवी थाली परोस दी।इस तरह मेहमान की भोजन की समस्या का समाधान हो गया। इससे प्रभावित होकर अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराजा अग्रसेन ने ‘एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत की घोषणा की। उन्होंने अपने इस सिद्धांत के मुताबिक नगर में आने वाले हर नए परिवार को नगर में रहने वाले हर परिवार की तरफ से एक ईट और एक रुपया देने के लिए कहा।ताकि नगर में आने वाला नया परिवार, नगर में पहले से रह रहे हर एक परिवार से प्राप्त ईटों अपने घर का निर्माण कर सकें एवं उन रुपयों से अपना बिजनेस स्थापित कर सकें।इस सिद्धांत की घोषणा के बाद महाराजा अग्रसेन जी को समाजवाद के प्रणेता के रुप में नई पहचान मिली।महाराजा अग्रसेन जी को उनके करुणामयी स्वभाव, समाजवाद के प्रवर्तक, युग पुरुष और राम राज्य के समर्थक के रुप में जाना जाता है। उनके द्धारा समाज के लिए किए गए महान कामों के लिए उन्हें युगो-युगांतर तक याद किया जाएगा। महाराजा अग्रसेन को कई पुरस्कार और सम्मान से नवाजा गया है। आइए जानते है।

महाराजा अग्रसेन को मिले सम्मान और पुरस्कार

प्रतापनगर के महाराजा अग्रसेन जी ने न सिर्फ व्यापार करने वाला अग्रवाल अथवा वैश्य समाज की उत्पत्ति की, बल्कि अपने महान विचारों एवं महान कामों के बल पर समाज को एक नई दिशा दी।वहीं महाराज अग्रसेन ने सभी को व्यापार एवं समाजवाद का महत्व भी समझाया। भारत सरकार ने 24 सितंबर , 1976 को उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। इसके अलावा भारत सरकार ने 1995 में महाराज अग्रसेन उनके सम्मान में एक जहाज लिया था।

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