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हैप्पी बर्थडे दूरदर्शन, फिर ताजा हुईं पुरानी यादें…

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हैप्पी बर्थडे दूरदर्शन, फिर ताजा हुईं पुरानी यादें…

उन दिनों को याद करिए जब देश में केबल चैनल उपलब्ध नहीं था और टीवी पर मात्र दूरदर्शन का ही बोलबाला था…

 
Samachar4media

उन दिनों को याद करिए जब देश में केबल चैनल उपलब्ध नहीं था और टीवी पर मात्र दूरदर्शन का ही बोलबाला था। दूरदर्शन के शुरुआती कार्यक्रमों की लोकप्रियता का मुकाबला आज के किसी चैनल के कार्यक्रम शायद ही कर पाएं। चाहे ‘रामायण’ हो या ‘महाभारत’, ‘चित्रहार’ हो या कोई फिल्म, ‘हम लोग’ हो या ‘बुनियाद’, इनके प्रसारण के समय जिस तरह लोग टीवी से चिपके रहते थे, वह सचमुच अनोखा था।

भारत में टेलिविजन के इतिहास की कहानी दूरदर्शन के इतिहास से ही शुरू होती है। संचार-क्रांति के मौजूदा दौर में भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक 92 प्रतिशत भारतीय घरों तक पहुंचने वाला आकाशवाणी के अलावा यह अकेला माध्यम है। आज भी हर एक भारतीय को इस पर गर्व है कि उसके पास दूरदर्शन के रूप में टेलिविजन का गौरवशाली इतिहास मौजूद है। आज भी दूरदर्शन का नाम सुनते ही अतीत के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद आ जाते है। टीवी चैनलों में निजी घरानों की बाढ़ के बीच दूरदर्शन सबसे बड़ा, सबसे सक्षम और सबसे अधिक उत्तरदायी चैनल समूह के रूप में स्थापित है।

दूरदर्शन का सफर

भारत के सबसे पुराने टीवी नेटवर्क दूरदर्शन को आज 15 सितंबर के दिन 62 साल पूरे हो गए हैं। 15 सितंबर 1959 को दूरदर्शन की शुरुआत हुई थी। शुरू में कई वर्षों तक दूरदर्शन भारत में शिक्षा, सूचना और मनोरंजन का प्रमुख स्रोत रहा। 1959 में जब सरकारी चैनल दूरदर्शन का प्रसारण शुरु हुआ तो वह किसी अजूबे से कम नहीं था तभी यह लोगों के बीच बुद्धू बक्से के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन उस बुद्धू बक्से का सफर आज 2021 में घर घर तक पहुंच गया। दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को परीक्षण के तौर पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया। उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में सिर्फ तीन दिन आधा-आधा घंटे होता था, तब इसको ‘टेलिविजन इंडिया’ नाम दिया गया था। बाद में 1975 में इसका हिंदी नामकरण ‘दूरदर्शन’ नाम से किया गया। यह दूरदर्शन नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि टीवी का हिंदी पर्याय बन गया।

शुरुआती दिनों में दिल्ली भर में 18 टेलिविजन सेट लगे थे और एक बड़ा ट्रांसमीटर लगा था, तब दिल्ली में लोग इसको आश्चर्य के साथ देखते थे। इसके बाद दूरदर्शन ने धीरे-धीरे अपने पैर पसारे और दिल्ली (1965), मुंबई (1972), कोलकाता (1975), चेन्नई (1975) में इसके प्रसारण की शुरुआत हुई। शुरुआत में तो दूरदर्शन दिल्ली और आस-पास के कुछ क्षेत्रों में ही देखा जाता था। दूरदर्शन को देश भर के शहरों में पहुंचाने की शुरुआत 80 के दशक में हुई। दरअसल इसकी वजह 1982 में दिल्ली में आयोजित होने वाले एशियाई खेल थे। एशियाई खेलों के दिल्ली में होने का एक लाभ यह भी मिला कि ब्लैकएंडव्हाइट दिखने वाला दूरदर्शन रंगीन हो गया था। फिर दूरदर्शन पर शुरू हुआ पारिवारिक कार्यक्रम ‘हम लोग’ जिसने लोकप्रियता के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए।

1984 में देश के गांव-गांव में दूरदर्शन पहुंचाने के लिए देश में लगभग हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया। इसके बाद आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी पर बना ‘बुनियाद’ कार्यक्रम, जिसने विभाजन की त्रासदी को उस दौर की पीढ़ी से परिचित कराया। इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ (मास्टर जी), अनीता कंवर (लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ घर-घर में लोकप्रिय हो चुके थे। फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारवाहिकों ने दूरदर्शन को घर-घर में पहचान दे दी। दूरदर्शन पर 1980 के दशक में प्रसारित होने वाले ‘मालगुडी डेज’, ‘ये जो है जिंदगी’, ‘रजनी’, ‘ही मैन’, ‘वाहः जनाब’, ‘तमस’, बुधवार और शुक्रवार को 8 बजे दिखाया जाने वाला फिल्मी गानों पर आधारित ‘चित्रहार’, ‘भारत एक खोज’, ‘व्योमकेश बक्शी’, ‘विक्रम बेताल’, ‘टर्निंग पॉइंट, ‘अलिफ लैला’, ‘फौजी’, ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘देख भाई देख’ ने देश भर में अपना एक खास दर्शक वर्ग ही नहीं तैयार कर लिया था बल्कि गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी इन धारवाहिकों को जबर्दस्त लोकप्रियता मिली।

‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे धार्मिक धारावाहिकों ने तो सफलता के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे, 1986 में शुरू हुए ‘रामायण’ और इसके बाद शुरू हुए ‘महाभारत’ के प्रसारण के दौरान रविवार को सुबह देश भर की सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसर जाता था और लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रमों से लेकर अपनी यात्रा तक इस समय पर नहीं करते थे। वहीं अगर विज्ञापनों की बात करें तो ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ जहां लोगों को एकता का संदेश देने में कामयाब रहा वहीं ‘बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर-हमारा बजाज’ से अपनी व्यावसायिक क्षमता का लोहा भी मनवाया।

ग्रामीण भारत के विकास में भी दूरदर्शन के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। सन् 1966 में कृषि दर्शन कार्यक्रम के द्वारा दूरदर्शन देश में हरित क्रांति लाने का सूत्रधार बना। सही मायने में अर्थपूर्ण कार्यक्रमों और भारतीय संस्कृति को बचाए रखते हुए देश की भावनाओं को स्वर देने का काम दूरदर्शन ने किया है।

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