राजीव और राहुल गांधी से कैसे बेहतर हैं सोनिया गांधी?: नज़रिया

राजीव और राहुल गांधी से कैसे बेहतर हैं सोनिया गांधी?: नज़रिया

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह हाल ही में पत्रकार धीरेंद्र कुमार झा की किताब ‘एसेटिक गेम्स’ के विमोचन कार्यक्रम में शामिल हुए.

ये किताब भारत में हिंदुत्ववादी राजनीति के उभार और राम मंदिर आंदोलन में अखाड़ों की राजनीति के योगदान पर नज़र डालती है.

इस दौरान जब दिग्विजय सिंह से कांग्रेस पार्टी की उन ग़लतियों पर खुलकर बात की जिन्होंने भारत में हिंदुत्ववादी राजनीति का उभार में अपनी भूमिका अदा की है.

 

कांग्रेस की ग़लतियां बताते हुए उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के दौर की कांग्रेस पर टिप्पणी करने से बचते हुए राजीव गांधी सरकार की ख़ामियों का ज़िक्र किया.

दिग्विजय सिंह कहते हैं, “विध्वंस (छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस) को रोका जा सकता था.”

अपने इस बयान में दिग्विजय सिंह सीधे-सीधे प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार के साथ-साथ राजीव गांधी को निशाना बना रहे थे.

उन्होंने राव सरकार के बचाव में ये नहीं बताया कि नरसिम्हा राव ने विश्व हिंदू परिषद के नेताओं से कोर्ट में एक हलफ़नामा लिया था जिसमें किसी तरह की हिंसा ना किए जाने का ज़िक्र था.

हालांकि, उन्होंने ये ज़रूर बताया कि इंदिरा गांधी ने हिंदुत्ववादी ताक़तों का किस तरह सामना किया था.

उन्होंने ये नहीं कहा कि राजीव गांधी के दिनों में केंद्र सरकार ने किस तरह उत्तर प्रदेश की वीर बहादुर सिंह सरकार के फ़ैसले को पलटते हुए 1986 में विवादित ढांचे के गेट खोलकर वहां पूजा-अर्चना करने की इजाज़त देकर राम मंदिर मुद्दे को भड़काया था.

लेकिन पूर्व राष्ट्रपति और इंदिरा गांधी के करीबी रहे कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब (टर्ब्यूलेंट ईयर्स 1980-96) में कांग्रेस के हिंदू वोटबैंक को बनाने के प्रोजेक्ट के लिए राजीव गांधी को दोषी ठहराया है.

 

राजीव गांधी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अपने करीबी सलाहकार और दूर के रिश्तेदार अरुण नेहरू के साथ मिलकर हिंदू जनमानस को लुभाने की कोशिश कर रहे थे.

साल 1984 के अक्टूबर में हुई इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तर भारत के कई शहरों में हिंदू भीड़ ने सिख समुदाय के लोगों का कत्लेआम किया.

कुछ संस्मरणों में ये भी सामने आता है कि सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस और हिंदूवादी ताकतें एक साथ मिलकर काम कर रही थीं.

शाह बानो प्रकरण कांग्रेस की बड़ी ग़लती

हालांकि, दिग्विजय सिंह ने शाह बानो केस का ज़िक्र करते हुए इसे राजीव गांधी सरकार की सबसे बड़ी ग़लती बताया.

एक तलाकशुदा मुसलमान महिला शाह बानो ने अपने पूर्व पति की ओर से किसी तरह का गुजारा भत्ता नहीं मिलने पर क्रिमिनल प्रोसीज़र कोड के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि क्रिमिनल प्रोविज़न कोड किसी भी पर्सनल लॉ से ऊपर है और सभी तलाकशुदा महिलाएं अपने पति से गुजारा-भत्ता लेने की हक़दार हैं चाहें वे किसी भी धर्म की हों.

इसके बाद राजीव गांधी ने अपने सबसे करीबी नेता और मंत्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की सलाह के बावजूद अपनी पार्टी के 415 सांसदों के बहुमत की बदौलत एक कानून को लाकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को निष्प्रभावी बना दिया.

वर्तमान राजनीति को देखने वाले राजनीतिक विश्लेषक सोचेंगे कि कांग्रेस की वर्तमान हालत के लिए राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी ज़िम्मेदार हैं.

 

क्योंकि वह पीएम मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी और आरएसएस को कड़ी टक्कर नहीं दे सके.

लेकिन जब मैंने दिग्विजय सिंह से इस बारे में पूछा तो उनकी प्रतिक्रिया से ये साफ़ हो गया कि हिंदुत्ववादी के उभार के लिए राजीव गांधी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

राहुल गांधी का इस्तीफ़ा
जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वह राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने के फ़ैसले से सहमत हैं.

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस स्थिति से बचा जा सकता है और इस फ़ैसले का समय भी सही नहीं था.

कश्मीर पर पल-पल बदलती राजनीति के साथ तीन तलाक विधेयक और यूएपीए कानून को पास होने से रुकवाने में विपक्ष की असफलता के बाद कांग्रेस के लिए अब यही बाकी था कि वह अपने लिए एक नए अध्यक्ष की तलाश शुरू करे.

राहुल की दृढ़ इच्छाशक्ति की वजह से आख़िरकार पार्टी की कमान सोनिया गांधी को अपने हाथ में लेनी पड़ी.

सोनिया ही कांग्रेस की अब तक सबसे ज़्यादा समय तक अध्यक्ष रहने वाली नेता हैं. राजीव गांधी भी शुरुआत से एक अनैच्छिक राजनेता थे.

 

साल 1981 में अपने भाई संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मौत की वजह से उन्हें राजनीति में आना पड़ा.

वह राजनीति से दूर रहकर एक पायलट के रूप में काम करना चाहते थे. लेकिन उन्होंने राजनीति में आने का फ़ैसला किया क्योंकि उनकी मां को मदद की ज़रूरत थी.

इसके बाद 1983 में वो कांग्रेस के पार्टी महासचिव बने. लेकिन जब वह कांग्रेस की बारीकियां ही सीख रहे थे तभी उनकी मां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने उन्हें सत्ता के केंद्र में ला दिया.

इस तरह राजीव गांधी मात्र चालीस साल की उम्र में देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने.

बोफोर्स कांड का दाग़
प्रधानमंत्री के रूप में भी उनके कार्यकाल में राजीव गांधी की उम्र और अनुभवहीनता दिखाई दी जिससे तत्कालीन समाज को हानि और लाभ दोनों हुए.

राजीव गांधी ने भारतीय मतदाता की उम्र 21 से घटाकर 18 साल कर दी.

राजीव सरकार में ही मजबूत पंचायती राज व्यवस्था की नींव पड़ी और टेलिकॉम क्षेत्र की नींव पड़ी.

लेकिन उनकी अनुभवहीनता की वजह से शाह बानो जैसी ग़लतियां और प्रेस की स्वतंत्रता को कम करने के लिए नए मानहानि क़ानून को लाने जैसी ग़लतियां हुईं.

पार्टी के अंदर राजीव गांधी ने खुद को उन लोगों के आसपास रखा जिनके पास राजनीतिक अनुभव तो कम लेकिन ताक़त अपार थी.

कई मौकों पर अरुण नेहरू और अरुण सिंह फै़सले लेते नज़र आए.

पार्टी महासचिव के रूप में नेहरू और राजनीतिक सलाहकार के रूप में अरुण सिंह के साथ राजीव गांधी की अनुभवहीनता जल्द ही उनकी सरकार के कामों में दिखाई देने लगी.

अपनी सरकार के आधे कार्यकाल में ही राजीव गांधी का नाम बोफोर्स तोप घोटाले में आया जो कि 1980-90 के दौर में सबसे बड़ा राजनीतिक स्कैंडल था.

कैसा था सोनिया गांधी का दौर?
वहीं, सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में ज़्यादा परिपक्व राजनेता के रूप में साबित हुईं.

साल 1998 में जब वह कांग्रेस में शामिल हुईं तो वह इसके लिए तैयार नहीं थीं. लेकिन इसके बाद वह सबसे ज़्यादा समय तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहने वाली नेता बनीं.

उन्होंने पार्टी के अंदर और बाहर उन लोगों से सफल गठबंधन किए जो कि ज़मीनी राजनीति से जुड़े हुए थे.

कांग्रेस के अंदर तो शीर्ष पर गांधी परिवार के सदस्य होने की वजह से उनके प्रति कांग्रेस नेताओं का समर्पण निश्चित था.

लेकिन सोनिया गाँधी ने अपने आसपास उन लोगों को रखा जोकि ज़मीनी राजनीति और राजनीतिक अनुभव के लिहाज़ से काफ़ी मजबूत थे. सोनिया गांधी के पास इसी चीज़ की कमी थी.

इसके बाद उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी में वाईएसआर राजशेखर रेड्डी, अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह, और भूपिंदर हुड्डा जैसे नेता विकसित हुए.

लेकिन राहुल के नेतृत्व संभालने के स्थिति में पार्टी अनिश्चितता का शिकार है.

कांग्रेस में ऐसे तमाम नेता हैं जो खुद को सोनिया गांधी के क़रीब बताते हैं लेकिन इनमें से कोई नेता ये दावा नहीं कर सकता कि सोनिया सिर्फ़ उनकी ही बात मानेगी.

सोनिया गांधी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी ये दावा नहीं कर सकते हैं.

यूपीए के दौर में सोनिया गांधी लगातार अपनी नेशनल एडवाइज़री कमेटी से सलाम-मशविरा किया करती थीं जो कि एक सुपर कैबिनेट जैसी थी. इसमें सिविल सोसाइटी के लोग शामिल थे.

लेकिन उन्होंने इसके साथ-साथ अपनी पार्टी के सदस्यों से सलाह लेना जारी रखा ताकि एक संतुलन स्थापित किया जा सके.

राजीव से इतर सोनिया गांधी को कांग्रेस की सेकुलर छवि से लगाव था जिसकी बदौलत उन्होंने सेकुलर नेताओं जैसे हरकिशन सिंह सुरजीत और लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर धर्मनिरपेक्षता के आधार पर एक गठबंधन बनाया. इस गठबंधन के साथ उन्होंने दस सालों तक केंद्र में सरकार चलाई.

सोनिया गांधी से राहुल गांधी तक का सफ़र कांग्रेस पार्टी के लिए आसान नहीं था. राहुल ने अपने पिता से कहीं ज़्यादा और कहीं ज़्यादा मेहनत से पार्टी के लिए काम किया. लेकिन उन्हें अपने पिता की तरह संसद में बहुमत का दौर देखने को नहीं मिला.

बीते दस-पंद्रह सालों के समय में कांग्रेस पार्टी के लिए ऐसा समय नहीं आया जब वह ये निश्चिंत हो सके कि राहुल गांधी का अगला क़दम क्या होगा.


एक कांग्रेस नेता ने मुझे यह भी बताया कि राहुल गांधी को ये नहीं पता था कि वह स्मृति ईरानी से अमेठी की सीट हार जाएंगे जो कि ये बताता है कि वह अपने आसपास किस तरह के सलाहकार रखते हैं.

2004 में राहुल पार्टी में शामिल हुए लेकिन अगले दस सालों तक कोई पद ग्रहण नहीं किया. वह लगातार कांग्रेस को उस तरह की पार्टी बनाने में लगे रहे जिसे गांधी परिवार के सदस्य की ज़रूरत न पड़े.

15 साल के बाद कांग्रेस की बुरी हालत होने के बाद सोनिया गांधी ने राहुल गांधी की चुनौती को अपने सिर लेकर साबित कर दिया है कि वह अपने बेटे और अपने पति से बेहतर राजनेता हैं.

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