लखीराम अग्रवाल बीजेपी के पितृ पुरुष….
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भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लखीराम अग्रवाल को याद करना सही मायने में राजनीति की उस परंपरा का स्मरण है जो आज के समय में दुर्लभ हो गयी है। वे सही मायने में हमारे समय के एक ऐसे नायक हैं जिसने अपने मन, वाणी और कर्म से जिस विचारधारा का साथ किया, उसे ताजिंदगी निभाया। यह प्रतिबद्धता भी आज के युग में असाधारण नहीं है। भारतीय जनता पार्टी में उनके योगदान के लिए छत्तीसगढ़ में पितृ पुरुष के नाम से भी जाना जाता है प्यार से कार्यकर्ता उन्हें काका जी कहकर बुलाते थे
छत्तीसगढ़ में भाजपा के ‘पितृ पुरूष’ कहे जाने वाले श्री लखी राम अग्रवाल का जन्म खरसिया में श्री मनसा राम अग्रवाल रांव एवं श्रीमती रूक्मणी देवी अग्रवाल के परिवार में हुआ। इनका विवाह श्रीमती मरबन देवी से 1950 में हुआ। ये पाँच पुत्र और एक पुत्री के गौरवशाली पिता रहे। इनकी शिक्षा-दिक्षा नहरपाली विद्यालय खरसिया में हुई। वर्तमान में इनके पुत्र श्री अमर अग्रवाल जी छत्तीसगढ़ शासन में केबिनट मंत्री हैं।
श्री अग्रवाल का सक्रिय राजनीति में आगमन 1960 में हुआ। वे 1964 से 1969 तक खरसिया नगर पालिका पद पर रहे तथा डिस्ट्रिक कार्पोरेटिव बैंक रायगढ़ के प्रमुख 1977 से 1980 तक रहे। साथ ही वे मध्यप्रदेश स्टेट मार्केटिक एसोशियेशन के उपाध्यक्ष भी रहे। 1977 में आपातकाल के दौरान उन्हे मीसा एक्ट के तहत बंदी बनाया गया।
मध्यप्रदेश भाजपा के प्रदेश महासचिव के पद पर 1983 में लखीराम जी सुशोभित हुये। साथ ही वे 10 अप्रेल 1990 से 31 अक्टूबर 2000 तक मध्यप्रदेश राज्य सभा के अध्यक्ष रहें। पुनः 1 नवम्बर 2000 से 9 अप्रैल 2002 तक उन्होंने राज्य सभा में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण एवं छत्तीसगढ़ अस्मिता के निर्माण में लखीराम जी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही।
श्री अग्रवाल जी का निधन 24 जनवरी 2009 को बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में हुआ। उनका दाह संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। उनकी स्मृति में 2013 में रायगढ़ में मेडिकल काॅलेज की स्थापना की गयी।
विचार को समर्पित एक जीवन
लखीराम अग्रवाल सही मायने में राज्य भाजपा के अभिभावक होने के साथ छत्तीसगढ़ में एक नैतिक उपस्थिति भी थे। उनके पास जाकर किसी भी स्तर का कार्यकर्ता अपनी बात कह सकता था। वे परिवार के एक ऐसे मुखिया थे जिनके पास सबकी सुनने का धैर्य और सबको सुनाने का साहस था। वे अपने कद और परिवार की मुखिया की हैसियत से किसी को भी कोई आदेश दे सकने की स्थिति में थे। उनकी बात प्रायः टाली नहीं जाती थी। वे एक ऐसा कंधा थे जिसपर आप अपनी पीड़ाएं उड़ेल सकते थे। असहमतियों के बावजूद वे सबके साथ संवाद करने के लिए दरवाजा खुला रखते थे। रायपुर से दिल्ली तक उन्होंने जो रिश्ते बनाए उनमें कृत्रिमता और बनावट नहीं थी। वे हमेशा अपने जीवन और कर्म से केवल और केवल पार्टी की सोचते रहे। उनके पुत्र अमर अग्रवाल ने अपने गृहनगर खरसिया और रायगढ़ को छोड़कर छत्तीसगढ़ के एक अलग शहर बिलासपुर को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, युवा मोर्चा के कार्यकर्ता के नाते काम प्रारंभ किया और वहां कांग्रेस की परंपरागत सीट पर चुनाव जीतकर अपनी जगह बनाई। आज वे छत्तीसगढ़ के सक्षम मंत्रियों में गिने जाते हैं। उनकी क्षमताओं पर किसी को संदेह नहीं है। ऐसे कठिन समय में जब राजनीति में मर्यादाविहीन आचरण के चिन्ह आम हैं। हर तरह का पतन राजनीतिक क्षेत्र में दिख रहा है। लखीराम अग्रवाल जैसे नायक की याद हमें प्रेरित करती है और बताती है कि कैसे व्यापार में रहकर भी शुचिता बनाए रखी जा सकती है। गृहस्थ होकर भी किस तरह से समाज के काम पूरा समय देकर किए जा सकते हैं। क्या आप इसे साहस नहीं मानेंगें कि किस तरह मप्र के सबसे कद्दावर मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह के खिलाप अपने क्षेत्र में व्यूह रचना तैयार करते और जिसके परिणामों की चिंता नहीं करते? अजीत जोगी जैसे ताकतवर मुख्यमंत्री के सामने तनकर खड़ा होते है और अपने दल की सरकार की स्थापना के लिए पूरा जोर लगा देते है। आज लखीराम अग्रवाल की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक लगती है।
असाधारण बनने का कथा
श्री लखीराम अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ के एक छोटे से नगर खरसिया से जो यात्रा शुरू की वह उन्हें मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद तक ले गयी। वे राज्यसभा के दो बार सदस्य भी रहे। लेकिन ये बातें बहुत मायने नहीं रखतीं। मायने रखते हैं वे संदर्भ और उनकी जीवन शैली जो उन्होंने पार्टी का काम करते समय लोगों को सिखायी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी के लिए उनका योगदान किसी से छिपा नहीं है। वे अंततः एक कार्यकर्ता थे और उनका दिल संगठन के लिए ही धड़कता था। भाजपा दिग्गज कुशाभाऊ ठाकरे से उनकी मुलाकात ने सही मायने में लखीराम अग्रवाल को पूरी तरह रूपांतरित कर दिया। वे संगठन को जीने लगे। खरसिया नगर पालिका के अध्यक्ष के रूप में प्रारंभ हुयी उनकी राजनीतिक यात्रा में अनेक ऐसे पड़ाव हैं जो प्रेरित करते हैं और प्रोत्साहित करते हैं। वे यह भी बताते हैं कि कैसे एक साधारण परिवार का व्यक्ति भी एक असाधारण शख्सियत बन सकता है। लखीराम अग्रवाल के हिस्से बड़ी राजनीतिक सफलताएं नहीं हैं, खरसिया से वे विधानसभा का चुनाव नहीं जीत सके। उनका इलाका कांग्रेस का एक ऐसा गढ़ है जहां आजतक भाजपा का कमल नहीं खिल सका। किंतु अपनी इस कमजोरी को उन्होंने अपनी शक्ति बना लिया। वे छत्तीसगढ़ में कमल खिलाने के प्रयासों में लग गए। आज पूरे राज्य में कार्यकर्ताओं का पूरा तंत्र उनकी प्रेरणा से ही काम कर रहा है। वे कार्यकर्ता निर्माण की प्रक्रिया को समझते थे। उनके निर्माण और उनके व्यवस्थापन की चिंता करते थे। संगठन की यह समझ ही उन्हें अपने समकालीनों के बीच उंचाई देती है।
आप देखें तो लखीराम अग्रवाल के पास ऐसा कुछ नहीं था जिसके आधार पर वे महत्वपूर्ण बनने की यात्रा शुरू कर सकें। खरसिया एक ऐसा इलाका था, जहां भाजपा का कोई आधार नहीं है। एक छोटा नगर जहां की राजनीतिक अहमियत भी बहुत नहीं है। इसके साथ ही लखीराम जी किसी विषय के गंभीर जानकार या अध्येता भी नहीं थे। किंतु उनमें संगठन शास्त्र की गहरी समझ थी। अपने निरंतर प्रवास और श्रम से उन्होंने सारी बाधाओं को पार किया। जशपुर के कुमार साहब दिलीप सिंह जूदेव, कवर्धा के एक डाक्टर रमन सिंह से लेकर तपकरा के एक नौजवान आदिवासी नेता नंदकुमार साय से लेकर आज की पीढ़ी के राजेश मूणत जैसे लोगों को साथ लेने और खड़ा करने का माद्दा उनमें था। छत्तीसगढ़ के हर शहर और क्षेत्र में उन्होंने ऐसे लोगों को खड़ा किया जो आज पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। आलोचनाओं से अविचल रहकर उन्होंने सिर्फ बेहतर परिणाम दिए। खरसिया के उस उपचुनाव को याद कीजिए जिसमें कुमार दिलीप सिंह जूदेव को मध्य प्रदेश के कद्दावर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खिलाफ मैदान में उतारा गया था। वह उपचुनाव हारकर भी भाजपा ने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जो आत्मविश्वास अर्जित किया, वह एक इतिहास है। इसके बाद भाजपा ने छत्तीसगढ़ में पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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