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कंगाल हुए पाकिस्‍तान में अब चलेगी भारतीय करेंसी !

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नई दिल्‍ली: पाकिस्तान के बेवकूफ सुल्तान ने ऐसी कुल्हाड़ी चला ली है कि अब उसके खुद का पैर कटना तय है। दुनिया के कर्जों से दबा इमरान खान अब नोट छापने के काम पर लग गया है। उसे लग रहा है कि ज्यादा नोट छापने से उसका सारा कर्जा उतर जाएगा। उसके देश में खुशहाली आ जाएगी, लेकिन हकीकत तो ये है कि उसकी इस हरकत से जिन्ना वाला नोट चलन के लायक भी नहीं बचेगा।

कठपुतली सुल्तान ने पाकिस्तान की ऐसी हालात बना दी है कि हो सकता है कि जिन्ना वाले पाकिस्तानी नोट की जगह अब गांधीजी वाले हिन्दुस्तानी नोट को चलाना पड़े। बस इतना समझ लीजिए पाकिस्तान के पास दो ही ऑप्शन है या तो गांधीजी वाली हमारी करेंसी अपना ले या फिर अपने आका जिनपिंग से चाइनीज करेंसी कबूल कर ले।

पहले से महंगाई की मार झेल रहे जिन्ना के मुल्क में हालात और भी भयावह होने वाले हैं। अब इमरान के पास कोई चारा नहीं बना है, ऐसे में मोदी कंगाल खान की मदद करेंगे। पाकिस्तान में अब जिन्ना छाप करेंसी के ना तो आटा चावल मिलेगा, ना तो दवाईयां मिलेंगी और ना ही गाड़ी में भरने के लिए डीजल-पेट्रोल ही मिलेगा। पाकिस्तान के लोगों की जेब में भी गांधी छाप करेंसी होगी और उसी से उनकी जिंदगी की गाड़ी चलेगी।

दरअसल, एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए पाकिस्तान की सरकार धड़ल्ले से नोटों की छपाई कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक एक वित्तीय साल में करीब 1.1 ट्रिलियन नोटों की संख्या बढ़ गई है। पाकिस्तान में नोट छापने के पेपर बनाने वाली ‘सिक्योरिटी पेपर्स लिमिटेड’ के फायदे में पिछले वित्तीय साल में 60 फिसदी से ज्यादा का फायदा दर्ज किया गया। एक तरफ जहां दुनिया में डिजिटल ट्रांजेक्शन का प्रचलन बढ़ रहा है, ऐसे में पाकिस्तान सरकार का ये कदम उसकी डूब रही आर्थिक स्थिति को साफ कर रही है।

पहले से कर्जे में डूबे खान साहब को अब ना तो कोई कर्ज देने के लिए तैयार है और ना ही वो किसी का उधार चुका पा रहे हैं। जनता अलग भूखों मरने की कगार पर है। आटे से लेकर चीनी और दवाई से लेकर डीजल पेट्रोल तक की कीमतें आसमान छू रही है। हर तरफ के दरवाजे बंद हो जाने के बाद बेवकूफ सुल्तान ने नोट छापने की मशीन का सहारा ले लिया, वो भी बिना ये सोचे की इसका नतीजा क्या होगा।

हाल से सालों में पाकिस्तान में किस कदर नोटों की छपाई की गई है, उसके आंकड़ों पर एक नजर डालिए। पाकिस्तान में सेंट्रल बैंक की वेबसाइट पर पिछले आठ वित्तीय वर्षों का एक आंकड़ा मौजूद है।

वित्त वर्ष 2012 के अंत में चलन में रही मुद्राओं की संख्या 1.73 ट्रिलियन थी

साल 2013 तक आंकड़ा बढ़कर 1.93 ट्रिलियन हो गई

साल 2014 के अंत में यह संख्या बढ़कर 2.17 ट्रिलियन हो गई

फिर अगले साल तक ये आंकड़ा 2.55 ट्रिलियन तक पहुंच गई

वित्त वर्ष 2016 में मुद्राओं की संख्या 3.33 ट्रिलियन पर जाकर बंद हुई

2017 में 3.91 ट्रिलियन और 2018 के अंत में 4.38 ट्रिलियन तक पहुंच गई

अब इसके बाद इमरान खान की सरकार सत्ता में आ चुकी थी। नतीजा यही हुआ कि जरूरत की चीजों से ज्यादा पैसा नेता, सेना के भ्रष्ट अफसर और उद्योपतियों की जेब में जाने लगा।

फाइनेंशियल ईयर 2019 के अंत होते होते नोटों की संख्या 4.95 ट्रिलियन के उच्च स्तर तक पहुंच गई। साल 2020 में हो इसमें बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई और आंकड़ा 6.14 ट्रिलियन पर पहुंच गई।

आतंकियों को फंडिंग, बाजवा सेना पर बेतहाशा पैसा बहाना और खुलेआम भ्रष्टाचार को छूट देना, अगर इस तरह की गललियां खान साहब नहीं करते तो शायद ये दिन देखने ना पड़ते। कम से कम इतिहास ही पढ़ लेते कि ऐसी हरकत के बदले में अफ्रीकी देश जिंबाब्वे का क्या हस्र हुआ था, जिसे मजबूरन अपनी करेंसी छोड़कर अमेरिकी डॉलर को अपनाना पड़ा था। कहीं ऐसा ना हो कि खान साहब को भी भारतीय नोट या फिर चीनी करेंसी से काम चलाना पड़े।

कुछ साल पहले जिंबाब्वे ने भी कुछ ऐसी ही गलती की थी, जिसका नतीजा हुआ कि वहां के पैसे की वैल्यू लगातार गिरती चली गई। लोगों को ब्रेड और अंडे जैसी बेसिक चीजें खरीदने के लिए भी बैग भर-भरकर पैसे देने पड़े। नौबत ये हो गई कि एक यूएस डॉलर की कीमत 25 मिलियन जिंबाब्वे डॉलर के बराबर हो गई।

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